परिचय
भारत के हर राज्य में एक ऐसा पद होता है जो राज्य का संवैधानिक मुखिया कहलाता है, लेकिन असली सत्ता उसके हाथ में नहीं होती। यह पद है – राज्यपाल का पद। बहुत से विद्यार्थी और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थी अक्सर राज्यपाल और मुख्यमंत्री की भूमिका को लेकर उलझन में पड़ जाते हैं।
इस लेख में हम राज्यपाल से जुड़ी हर जरूरी बात को आसान भाषा में समझेंगे- राज्यपाल की नियुक्ति कैसे होती है, उसके पास कौन-कौन सी शक्तियां होती हैं, उसका कार्यकाल कितना होता है, और उसे पद से कैसे हटाया जा सकता है। यह जानकारी RAS, UPSC, राज्य PSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वालों के साथ-साथ आम पाठकों के लिए भी उतनी ही उपयोगी है।
राज्यपाल एक नजर में
| बिंदु | जानकारी |
|---|---|
| पद का नाम | राज्यपाल (Governor) |
| संवैधानिक प्रावधान | अनुच्छेद 153 से 167 (संविधान का भाग VI) |
| नियुक्तिकर्ता | भारत के राष्ट्रपति |
| न्यूनतम आयु | 35 वर्ष |
| आवश्यक योग्यता | भारतीय नागरिकता |
| कार्यकाल | सामान्यतः 5 वर्ष, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत |
| शपथ दिलाने वाला | संबंधित राज्य के हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश |
| मुख्य शक्तियां | कार्यपालिका, विधायी, वित्तीय, न्यायिक, स्वविवेकीय |
| वेतन का स्रोत | राज्य की संचित निधि |
जरूरी नोट: राज्यपाल का वेतन, भत्ते और कुछ नियम समय-समय पर संशोधित होते रहते हैं। नवीनतम और सटीक आंकड़ों के लिए संबंधित राज्य के राजभवन या भारत सरकार की आधिकारिक वेबसाइट जरूर देखें।
राज्यपाल कौन होता है? (संवैधानिक स्थिति)
सरल शब्दों में कहें तो राज्यपाल राज्य का पहला नागरिक और संवैधानिक प्रमुख होता है। भारतीय संविधान के भाग VI में अनुच्छेद 153 से 167 तक राज्य की कार्यपालिका के बारे में बताया गया है। इस कार्यपालिका के तीन मुख्य हिस्से होते हैं:
- राज्यपाल
- मुख्यमंत्री और उनकी मंत्रिपरिषद
- राज्य का महाधिवक्ता
अनुच्छेद 154 के अनुसार राज्य की सारी कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होती है। लेकिन व्यवहार में यह शक्ति राज्यपाल खुद इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि मुख्यमंत्री और उनकी मंत्रिपरिषद के जरिए इस्तेमाल होती है। इसीलिए राज्यपाल को “नाममात्र का मुखिया” कहा जाता है, जबकि मुख्यमंत्री असली यानी वास्तविक कार्यपालिका प्रमुख होते हैं।
आसान भाषा में समझें तो राज्यपाल का काम एक संरक्षक जैसा है। वह यह सुनिश्चित करता है कि राज्य में संविधान के मुताबिक काम हो, जबकि रोजमर्रा का शासन मुख्यमंत्री और उनकी टीम चलाती है।
एक दिलचस्प बात यह भी है कि 7वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 के बाद एक ही व्यक्ति को एक साथ दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल बनाया जा सकता है।
राज्यपाल क्यों जरूरी है?
राज्यपाल का पद सिर्फ रस्मी नहीं है। यह केंद्र और राज्य के बीच एक कड़ी का काम करता है। राज्यपाल दो भूमिकाएं एक साथ निभाते हैं- राज्य के संवैधानिक प्रमुख के रूप में, और केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में, खासकर तब जब राज्य में संवैधानिक संकट खड़ा हो। यही वजह है कि जब भी राज्य में राजनीतिक अस्थिरता होती है, जैसे किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलना, तब राज्यपाल की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
राज्यपाल की नियुक्ति कैसे होती है? (अनुच्छेद 155)
राज्यपाल का चुनाव जनता सीधे नहीं करती। न ही राष्ट्रपति की तरह इसके लिए कोई निर्वाचक मंडल बनता है। अनुच्छेद 155 के अनुसार राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुहर सहित एक वारंट (आदेश पत्र) जारी करके राज्यपाल की नियुक्ति करते हैं।
व्यवहार में राष्ट्रपति केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही यह नियुक्ति करते हैं। यानी असल में राज्यपाल की नियुक्ति में केंद्र सरकार की सिफारिश की अहम भूमिका होती है।
नियुक्ति से जुड़ी दो परंपराएं:
- जिस राज्य का राज्यपाल बनाया जा रहा है, वह व्यक्ति उसी राज्य का मूल निवासी नहीं होना चाहिए, ताकि वह स्थानीय राजनीति से प्रभावित न हो।
- नियुक्ति से पहले राष्ट्रपति संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से सलाह लेते हैं।
ध्यान रहे, ये दोनों बातें परंपरा हैं, कानूनी बाध्यता नहीं। इसीलिए इतिहास में कई बार इनका पालन नहीं भी हुआ है।
संविधान सभा ने नियुक्ति का रास्ता क्यों चुना?
संविधान बनाते समय यह सवाल उठा था कि राज्यपाल को जनता सीधे चुने या राष्ट्रपति नियुक्त करें। संविधान सभा ने नियुक्ति का रास्ता इसलिए चुना क्योंकि:
- चुनाव से मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच सत्ता का टकराव बढ़ सकता था।
- एक निर्वाचित राज्यपाल किसी राजनीतिक दल से जुड़ा हो सकता था, जिससे उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठते।
- भारत ने अमेरिकी मॉडल (जहां गवर्नर चुना जाता है) की बजाय कनाडा के मॉडल को अपनाया, जिसमें केंद्र सरकार गवर्नर को नियुक्त करती है।
सरकारिया आयोग ने भी सुझाव दिया था कि राज्यपाल की नियुक्ति से पहले मुख्यमंत्री से सलाह लेना संवैधानिक रूप से अनिवार्य किया जाए।
राज्यपाल बनने के लिए योग्यता (अनुच्छेद 157)
राज्यपाल बनने के लिए संविधान ने सिर्फ दो शर्तें रखी हैं:
- व्यक्ति भारत का नागरिक होना चाहिए।
- उसकी आयु कम से कम 35 वर्ष होनी चाहिए।
यानी राष्ट्रपति या सांसद जैसी कोई शैक्षणिक योग्यता या अनुभव की शर्त संविधान में नहीं रखी गई है। हालांकि व्यवहार में राज्यपाल पद पर आमतौर पर ऐसे व्यक्ति नियुक्त किए जाते हैं जिन्हें सार्वजनिक जीवन, प्रशासन या राजनीति का लंबा अनुभव हो।
अनुच्छेद 158 के तहत कुछ शर्तें भी हैं:
- राज्यपाल संसद या किसी राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं हो सकता। अगर कोई सांसद या विधायक राज्यपाल बनता है, तो उसकी वह सदस्यता अपने आप खत्म हो जाती है।
- राज्यपाल कोई अन्य लाभ का पद (Office of Profit) नहीं रख सकता।
- राज्यपाल को बिना किराए का राजभवन और अन्य सुविधाएं मिलती हैं।
राज्यपाल की शपथ (अनुच्छेद 159)
पद संभालने से पहले हर राज्यपाल को शपथ लेनी होती है। यह शपथ संबंधित राज्य के हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दिलाते हैं। अगर मुख्य न्यायाधीश उपलब्ध न हों, तो हाईकोर्ट के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश यह शपथ दिलाते हैं। शपथ में राज्यपाल यह वचन देते हैं कि वे संविधान और कानून की रक्षा करेंगे तथा राज्य की जनता की सेवा और भलाई के लिए काम करेंगे।
राज्यपाल का कार्यकाल (अनुच्छेद 156)
राज्यपाल का सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। लेकिन यहां एक जरूरी बात समझनी चाहिए- राज्यपाल यह पद “राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत” यानी राष्ट्रपति की इच्छा तक ही रखता है। इसका मतलब है कि राष्ट्रपति चाहें तो 5 साल पूरे होने से पहले भी राज्यपाल को पद से हटा सकते हैं।
कुछ जरूरी तथ्य:
- राज्यपाल खुद भी राष्ट्रपति को लिखित पत्र देकर इस्तीफा दे सकते हैं।
- कार्यकाल खत्म होने के बाद भी, जब तक नया राज्यपाल पद नहीं संभाल लेता, तब तक पुराना राज्यपाल पद पर बना रहता है।
- एक ही व्यक्ति को कितनी भी बार राज्यपाल बनाया जा सकता है।
- राष्ट्रपति किसी राज्यपाल का तबादला दूसरे राज्य में भी कर सकते हैं।
- अगर राज्यपाल की अचानक मृत्यु हो जाए, तो संबंधित राज्य के हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अस्थायी रूप से राज्यपाल का कार्यभार संभालते हैं (अनुच्छेद 160)।
दिलचस्प बात यह है कि संविधान में राज्यपाल को हटाने के स्पष्ट आधार नहीं बताए गए हैं। बी.पी. सिंघल बनाम भारत संघ (2010) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि राज्यपाल को सिर्फ राजनीतिक कारणों से नहीं हटाया जाना चाहिए।
राज्यपाल का वेतन और सुविधाएं (अनुच्छेद 158)
राज्यपाल को हर महीने एक निश्चित वेतन मिलता है, साथ ही मुफ्त आवास (राजभवन), यात्रा भत्ता और अन्य सुविधाएं भी मिलती हैं। संविधान की दूसरी अनुसूची में राज्यपाल के वेतन का जिक्र है।
कुछ जरूरी नियम:
- राज्यपाल का वेतन और भत्ते राज्य की संचित निधि से दिए जाते हैं।
- अगर कोई व्यक्ति एक साथ दो राज्यों का राज्यपाल है, तो दोनों राज्य मिलकर उसका वेतन देते हैं।
- राज्यपाल के कार्यकाल के दौरान उसका वेतन घटाया नहीं जा सकता।
- रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली पेंशन भारत की संचित निधि से आती है।
चूंकि वेतन में समय-समय पर संशोधन होता रहता है, इसलिए सटीक और नवीनतम आंकड़े के लिए संबंधित राज्य सरकार की आधिकारिक अधिसूचना देखना बेहतर रहेगा।
राज्यपाल की शक्तियां और कार्य
राज्यपाल के अधिकार मोटे तौर पर पांच हिस्सों में बांटे जा सकते हैं। आइए इन्हें एक-एक करके आसान भाषा में समझते हैं।
1. कार्यपालिका शक्तियां
- राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है और मुख्यमंत्री की सलाह पर बाकी मंत्रियों की नियुक्ति करता है।
- राज्य सरकार का हर कामकाज राज्यपाल के नाम पर ही चलता है (अनुच्छेद 166)।
- राज्यपाल राज्य के महाधिवक्ता की नियुक्ति करता है।
- राज्य लोक सेवा आयोग (जैसे RPSC) के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति भी राज्यपाल करता है।
- राज्यपाल राज्य के विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति भी होता है।
- जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापना और प्रमोशन राज्यपाल हाईकोर्ट से सलाह लेकर करता है (अनुच्छेद 233)।
2. विधायी शक्तियां
- राज्यपाल राज्य विधानमंडल का अभिन्न हिस्सा होता है, यानी विधानसभा-विधान परिषद के साथ राज्यपाल भी विधानमंडल का हिस्सा माना जाता है (अनुच्छेद 168)।
- राज्यपाल विधानमंडल का सत्र बुला सकता है, सत्र स्थगित कर सकता है और विधानसभा भंग भी कर सकता है (अनुच्छेद 174)।
- हर साल के पहले सत्र में और आम चुनाव के बाद पहले सत्र में राज्यपाल विशेष अभिभाषण देता है (अनुच्छेद 176)।
- विधान परिषद वाले राज्यों में राज्यपाल कुल सदस्यों के 1/6 हिस्से को साहित्य, विज्ञान, कला, समाजसेवा जैसे क्षेत्रों से मनोनीत करता है।
विधेयक पर राज्यपाल के पास चार विकल्प (अनुच्छेद 200):
जब विधानसभा से कोई विधेयक पास होकर राज्यपाल के पास आता है, तो उसके सामने चार रास्ते होते हैं- विधेयक को स्वीकृति दे दें; स्वीकृति रोक लें (आत्यंतिक वीटो); विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दें (धन विधेयक को छोड़कर); या विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख दें।
याद रखें: राज्यपाल के पास “पॉकेट वीटो” नहीं होता, यह अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति के पास है।
3. वित्तीय शक्तियां
- राज्यपाल की सिफारिश के बिना धन विधेयक विधानसभा में पेश ही नहीं हो सकता।
- राज्यपाल हर साल वित्त मंत्री के जरिए राज्य का वार्षिक बजट विधानसभा में पेश करवाता है।
- राज्य की आकस्मिकता निधि राज्यपाल के अधीन होती है, हालांकि खर्च मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही होता है।
- हर पांच साल में राज्यपाल पंचायतों और नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति जांचने के लिए राज्य वित्त आयोग बनाता है।
4. न्यायिक शक्तियां
राज्यपाल के पास क्षमादान की शक्ति होती है (अनुच्छेद 161)। इसके तहत वह पांच तरह के फैसले ले सकता है- क्षमा (दोषी को सभी सजाओं से मुक्त करना), लघुकरण (सजा की प्रकृति बदलना, जैसे मृत्युदंड को कठोर कारावास में बदलना), परिहार (सजा की अवधि कम करना), विराम (खास परिस्थिति में सजा कम करना, जैसे बीमारी के कारण), और प्रविलंबन (सजा पर अस्थायी रोक लगाना)।
एक जरूरी बात यह है कि राज्यपाल मृत्युदंड को पूरी तरह माफ नहीं कर सकता- यह अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति के पास है। राज्यपाल ज्यादा से ज्यादा मृत्युदंड को स्थगित कर सकता है।
5. स्वविवेकीय (Discretionary) शक्तियां
यह राज्यपाल की सबसे चर्चित और विवादित शक्ति है। अनुच्छेद 163 के अनुसार राज्यपाल की शक्तियां दो तरह की होती हैं- एक जो मंत्रिपरिषद की सलाह से इस्तेमाल होती हैं, और दूसरी जो राज्यपाल अपने विवेक से खुद इस्तेमाल कर सकता है।
स्वविवेकीय शक्तियों के मुख्य उदाहरण:
- किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखना
- राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) की सिफारिश करना
- जब किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिले, तब मुख्यमंत्री का चुनाव करना
- मुख्यमंत्री को बहुमत साबित करने के लिए समय-सीमा तय करना
- सरकार अल्पमत में आने पर विधानसभा भंग करना
ध्यान रहे, यह स्वविवेक असीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि राज्यपाल मनमाने ढंग से इन शक्तियों का इस्तेमाल नहीं कर सकता, इसके पीछे ठोस और तर्कसंगत कारण होने चाहिए।
राज्यपाल बनाम राष्ट्रपति: क्या अंतर है?
अक्सर विद्यार्थी राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों को लेकर कन्फ्यूज हो जाते हैं। नीचे दी गई तालिका से यह अंतर आसानी से समझ आ जाएगा।
| बिंदु | राष्ट्रपति | राज्यपाल |
|---|---|---|
| नियुक्ति | निर्वाचक मंडल द्वारा | राष्ट्रपति द्वारा |
| वीटो शक्ति | पॉकेट वीटो भी उपलब्ध | पॉकेट वीटो नहीं |
| आपातकालीन शक्ति | राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर सकते हैं | ऐसी कोई शक्ति नहीं |
| सैन्य शक्ति | तीनों सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर | कोई सैन्य शक्ति नहीं |
| मृत्युदंड माफी | पूर्ण रूप से माफ कर सकते हैं | पूरी तरह माफ नहीं कर सकते |
| मंत्रियों की सलाह | 42वें संशोधन के बाद बाध्यकारी | बाध्यकारी नहीं, स्वविवेक भी है |
| कूटनीतिक शक्ति | संधि व राजदूत नियुक्ति | ऐसी कोई शक्ति नहीं |
राज्यपाल को पद से हटाना और कानूनी सुरक्षा
जैसा हमने ऊपर पढ़ा, संविधान ने राज्यपाल को हटाने का कोई तय आधार नहीं बताया है। व्यावहारिक रूप से राष्ट्रपति, केंद्र सरकार की सलाह पर, किसी भी समय राज्यपाल को हटा सकते हैं।
राज्यपाल को कुछ कानूनी सुरक्षा भी मिलती है (अनुच्छेद 361):
- कार्यकाल के दौरान राज्यपाल के खिलाफ कोई आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं हो सकता।
- राज्यपाल को कार्यकाल के दौरान गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।
- व्यक्तिगत मामले को लेकर सिविल केस करने के लिए पहले राज्यपाल को दो महीने का नोटिस देना जरूरी है।
ध्यान दें, ये उन्मुक्तियां सिर्फ कार्यकाल के दौरान लागू होती हैं। पद छोड़ने के बाद राज्यपाल के खिलाफ सामान्य नागरिक की तरह ही कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
राज्यपाल पद से जुड़ी प्रमुख समितियां और सिफारिशें
समय-समय पर अलग-अलग समितियों और आयोगों ने राज्यपाल पद में सुधार को लेकर सुझाव दिए हैं।
| समिति/आयोग | मुख्य सिफारिश |
|---|---|
| प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1966) | नियुक्ति से पहले मुख्यमंत्री से सलाह ली जाए |
| राजमन्नार समिति (1969) | “प्रसादपर्यंत” पद की जगह निश्चित सुरक्षा मिले |
| सरकारिया आयोग (1983) | सबसे ज्यादा बहुमत वाले दल को ही सरकार बनाने बुलाया जाए |
| पुंछी आयोग (2007) | हटाने के लिए महाभियोग जैसी स्पष्ट प्रक्रिया अपनाई जाए |
इन सिफारिशों से साफ पता चलता है कि राज्यपाल पद को लेकर लंबे समय से सुधार की मांग होती रही है, खासकर नियुक्ति और हटाने की प्रक्रिया को लेकर।
राज्यपाल से जुड़े विवाद और आलोचनाएं
- राज्यपाल का पद अक्सर राजनीतिक रूप से रिटायर हो चुके नेताओं को “इनाम” के तौर पर दिया गया माना जाता है।
- स्वविवेकीय शक्तियों के इस्तेमाल में केंद्र सरकार का प्रभाव दिखने के आरोप लगते रहे हैं।
- कार्यकाल पूरा होने से पहले राज्यपालों को हटाए जाने के मामले भी सामने आते रहे हैं।
- कुछ विशेषज्ञ राज्यपाल को सिर्फ केंद्र का प्रतिनिधि मानते हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 1979 में साफ किया था कि यह एक स्वतंत्र संवैधानिक पद है, केंद्र सरकार की नौकरी नहीं।
इस भूमिका को लेकर एक मशहूर बात यह भी कही जाती है कि सरोजिनी नायडू ने राज्यपाल को “सोने के पिंजरे में बंद चिड़िया” कहा था- यानी पद तो शानदार है, लेकिन असली शक्ति सीमित है।
मिथक बनाम तथ्य
| मिथक | तथ्य |
|---|---|
| राज्यपाल को जनता चुनती है | गलत- राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं |
| राज्यपाल के पास असीमित स्वविवेक है | गलत- यह विवेक सीमित और तर्कसंगत होना चाहिए |
| राज्यपाल मृत्युदंड पूरी तरह माफ कर सकता है | गलत- यह अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति के पास है |
| राज्यपाल के पास पॉकेट वीटो है | गलत- पॉकेट वीटो सिर्फ राष्ट्रपति के पास है |
| संविधान में हटाने का तरीका साफ लिखा है | गलत- संविधान में इसका कोई स्पष्ट आधार नहीं है |
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयारी टिप्स
- अनुच्छेद संख्या (153-167, 200, 213, 356, 361) टेबल बनाकर याद करें, क्रम में पढ़ने से भूलने की गुंजाइश कम रहती है।
- राज्यपाल की स्वविवेकीय शक्तियों और सामान्य शक्तियों में अंतर जरूर समझें- प्रीलिम्स में यही सबसे ज्यादा पूछा जाता है।
- राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों की तुलना तैयार रखें, यह मेन्स के लिए भी उपयोगी है।
- सुप्रीम कोर्ट के जरूरी फैसले (एस.आर. बोम्मई, बी.पी. सिंघल, हरगोविंद पंत) एक-एक लाइन में याद रखें।
- सरकारिया, पुंछी और राजमन्नार जैसी समितियों की सिफारिशों को अलग-अलग रटने की बजाय एक तुलनात्मक तालिका बनाकर पढ़ें।
आम गलतियां जो विद्यार्थी अक्सर करते हैं
- राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों को एक जैसा मान लेना
- यह सोचना कि राज्यपाल हर काम मंत्रिपरिषद की सलाह से ही करता है
- अध्यादेश जारी करने की शक्ति को स्वविवेकीय शक्ति समझ लेना, जबकि यह मंत्रिपरिषद की सलाह से ही इस्तेमाल होती है
- यह भूल जाना कि राज्यपाल के पास पॉकेट वीटो नहीं होता
संबंधित विषय
राज्यपाल के विषय को पूरी तरह समझने के लिए ये जुड़े हुए टॉपिक भी जरूर पढ़ें: मुख्यमंत्री और राज्य मंत्रिपरिषद की भूमिका, राष्ट्रपति की शक्तियां और कार्य, राज्य विधानसभा और विधान परिषद, अनुच्छेद 356 और राष्ट्रपति शासन, भारत के संविधान का भाग VI।
निष्कर्ष
राज्यपाल भारत के संवैधानिक ढांचे की एक बेहद अहम कड़ी है। वह राज्य का संवैधानिक मुखिया तो है ही, साथ ही केंद्र और राज्य के बीच एक पुल का भी काम करता है। हालांकि रोजमर्रा का शासन मुख्यमंत्री और उनकी मंत्रिपरिषद चलाती है, लेकिन जरूरत पड़ने पर, खासकर राजनीतिक अस्थिरता के समय, राज्यपाल की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
उम्मीद है इस लेख से आपको राज्यपाल से जुड़ी हर जरूरी जानकारी- नियुक्ति से लेकर शक्तियां, कार्यकाल से लेकर हटाने की प्रक्रिया तक साफ-साफ समझ आ गई होगी। संविधान से जुड़े प्रावधानों में समय-समय पर संशोधन होता रहता है, इसलिए तैयारी करते समय नवीनतम संशोधन और सरकारी अधिसूचनाओं को जरूर जांचते रहें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
राज्यपाल किसे कहा जाता है?
राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है, जिसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 153 के तहत हर राज्य के लिए नियुक्त किया जाता है। वह राज्य का प्रथम नागरिक माना जाता है, लेकिन असली प्रशासनिक शक्ति मुख्यमंत्री और उनकी मंत्रिपरिषद के पास होती है। राज्यपाल राज्य में संविधान का पालन सुनिश्चित करने के साथ-साथ केंद्र और राज्य सरकार के बीच एक कड़ी का काम भी करता है। एक ही व्यक्ति एक साथ दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल भी हो सकता है, यह प्रावधान 7वें संविधान संशोधन के बाद जोड़ा गया था।
राज्यपाल की नियुक्ति किस अनुच्छेद के तहत होती है?
राज्यपाल की नियुक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 155 के तहत होती है। इसके अनुसार राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुहर सहित एक औपचारिक वारंट जारी करके राज्यपाल की नियुक्ति करते हैं। व्यवहार में यह नियुक्ति केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर होती है, इसलिए कहा जा सकता है कि इसमें केंद्र सरकार की अहम भूमिका होती है। नियुक्ति से पहले परंपरा के अनुसार संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से सलाह ली जाती है, हालांकि यह कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है।
राज्यपाल बनने के लिए क्या योग्यताएं जरूरी हैं?
संविधान के अनुच्छेद 157 के अनुसार राज्यपाल बनने के लिए सिर्फ दो शर्तें जरूरी हैं। पहली, व्यक्ति भारत का नागरिक होना चाहिए। दूसरी, उसकी उम्र कम से कम 35 वर्ष होनी चाहिए। इसके अलावा कोई शैक्षणिक योग्यता की शर्त संविधान में नहीं रखी गई है। साथ ही अनुच्छेद 158 के तहत यह भी जरूरी है कि वह व्यक्ति संसद या किसी राज्य विधानमंडल का सदस्य न हो, और न ही किसी अन्य लाभ के पद पर हो।
राज्यपाल का कार्यकाल कितने साल का होता है?
राज्यपाल का सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष का होता है, जो अनुच्छेद 156 में बताया गया है। लेकिन यह कार्यकाल “राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत” होता है, यानी राष्ट्रपति चाहें तो 5 साल पूरे होने से पहले भी राज्यपाल को हटा सकते हैं। राज्यपाल खुद भी चाहें तो राष्ट्रपति को पत्र लिखकर इस्तीफा दे सकते हैं। कार्यकाल खत्म होने के बाद भी, जब तक अगला राज्यपाल पद नहीं संभाल लेता, तब तक मौजूदा राज्यपाल पद पर बना रहता है।
राज्यपाल को पद से कौन और कैसे हटा सकता है?
संविधान में राज्यपाल को हटाने का कोई स्पष्ट आधार नहीं बताया गया है। व्यावहारिक रूप से राष्ट्रपति, केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर, किसी भी समय राज्यपाल को पद से हटा सकते हैं। बी.पी. सिंघल बनाम भारत संघ (2010) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि राज्यपाल को सिर्फ राजनीतिक कारणों के आधार पर नहीं हटाया जाना चाहिए, इसके पीछे कोई ठोस वजह होनी चाहिए। पुंछी आयोग जैसी समितियों ने महाभियोग जैसी स्पष्ट प्रक्रिया अपनाने की सिफारिश भी की है।
राज्यपाल की सैलरी और सुविधाएं क्या हैं?
राज्यपाल को हर महीने एक निश्चित वेतन मिलता है, जिसका जिक्र संविधान की दूसरी अनुसूची में है। इसके साथ ही उन्हें बिना किराए का राजभवन, यात्रा भत्ता और अन्य सुविधाएं भी मिलती हैं। यह वेतन और भत्ते राज्य की संचित निधि से दिए जाते हैं, जबकि रिटायरमेंट के बाद पेंशन भारत की संचित निधि से आती है। कार्यकाल के दौरान राज्यपाल का वेतन घटाया नहीं जा सकता। चूंकि वेतन में समय-समय पर संशोधन होता है, सटीक जानकारी के लिए आधिकारिक अधिसूचना देखना बेहतर है।
राज्यपाल के पास कौन-कौन सी शक्तियां होती हैं?
राज्यपाल के पास मुख्य रूप से पांच तरह की शक्तियां होती हैं- कार्यपालिका, विधायी, वित्तीय, न्यायिक और स्वविवेकीय। कार्यपालिका शक्तियों के तहत वह मुख्यमंत्री और मंत्रियों की नियुक्ति करता है। विधायी शक्तियों में विधानसभा सत्र बुलाना और विधेयकों पर स्वीकृति देना शामिल है। वित्तीय शक्तियों में बजट पेश करवाना आता है। न्यायिक शक्तियों में क्षमादान का अधिकार शामिल है। स्वविवेकीय शक्तियों के तहत वह राष्ट्रपति शासन की सिफारिश जैसे फैसले खुद अपने विवेक से ले सकता है।
राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों में क्या अंतर है?
राज्यपाल और राष्ट्रपति दोनों अपने-अपने स्तर पर संवैधानिक प्रमुख होते हैं, लेकिन दोनों की शक्तियों में कई अंतर हैं। राष्ट्रपति के पास पॉकेट वीटो, सैन्य शक्तियां और राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करने का अधिकार है, जबकि राज्यपाल के पास ये शक्तियां नहीं होतीं। राष्ट्रपति मृत्युदंड को पूरी तरह माफ कर सकते हैं, जबकि राज्यपाल सिर्फ उसे स्थगित कर सकता है। इसके अलावा 42वें संविधान संशोधन के बाद राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य हैं, जबकि राज्यपाल के पास कुछ मामलों में स्वविवेक का अधिकार भी है।
राज्यपाल के विवेकाधीन (स्वविवेकीय) अधिकार क्या हैं?
राज्यपाल के स्वविवेकीय अधिकार अनुच्छेद 163 के तहत आते हैं, जिनमें वह मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना खुद फैसला ले सकता है। इनमें प्रमुख हैं- किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखना, राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करना, और जब किसी दल को स्पष्ट बहुमत न मिले तब मुख्यमंत्री का चुनाव करना। हालांकि यह विवेक असीमित नहीं है, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि इन शक्तियों का इस्तेमाल तर्कसंगत आधार पर ही होना चाहिए, मनमाने ढंग से नहीं।
क्या एक व्यक्ति एक साथ दो राज्यों का राज्यपाल हो सकता है?
हां, बिल्कुल हो सकता है। 7वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 के बाद यह प्रावधान जोड़ा गया कि एक ही व्यक्ति को एक साथ दो या उससे अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में उसका वेतन और भत्ते दोनों राज्यों के बीच राष्ट्रपति द्वारा तय किए गए अनुपात में बांटे जाते हैं। हालांकि उसे मिलने वाला कुल वेतन एक सामान्य राज्यपाल के वेतन के बराबर ही रहता है, सिर्फ भुगतान का स्रोत अलग-अलग राज्यों में बंट जाता है।
राज्यपाल को कानूनी कार्रवाई से क्या छूट मिलती है?
अनुच्छेद 361 के तहत राज्यपाल को कुछ खास कानूनी छूट मिलती है। कार्यकाल के दौरान उनके खिलाफ कोई आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं हो सकता और न ही उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है। व्यक्तिगत मामले को लेकर सिविल केस करने के लिए पहले राज्यपाल को कम से कम दो महीने का लिखित नोटिस देना जरूरी है। ध्यान रहे, यह छूट सिर्फ कार्यकाल के दौरान लागू होती है। पद छोड़ने के बाद राज्यपाल के खिलाफ सामान्य नागरिक की तरह ही कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
राज्यपाल राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) की सिफारिश कब करता है?
जब राज्यपाल को यह लगता है कि राज्य में संविधान के मुताबिक शासन चलाना संभव नहीं रह गया है, जैसे किसी सरकार का बहुमत खो देना और वैकल्पिक सरकार न बन पाना, तब वह राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजकर राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर सकता है। यह राज्यपाल की स्वविवेकीय शक्ति है। एस.आर. बोम्मई मामले (1994) में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि इस शक्ति के दुरुपयोग को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है, और यह शक्ति सिर्फ अंतिम विकल्प के रूप में इस्तेमाल होनी चाहिए।










