लोकोक्तियाँ II Lokoktiyan II 150+ Important II

लोकोक्तियाँ (Lokoktiyan)

लोकोक्तियाँ (Lokoktiyan) का अर्थ है- कहावतें । लोकोक्तियाँ या कहावतें हिंदी व्याकरण का एक महत्वपूर्ण विषय है जिसके बारे में अक्सर परीक्षाओं में तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछा जाता है।

कुछ मुख्य लोकोक्तियाँ (Lokoktiyan) ज्ञानकोश की वृद्धि हेतु दिए जा रहे हैं, जिनके प्रयोग करने से भावी व वर्तमान परीक्षार्थियों को अधिक से अधिक लाभ प्राप्त हो।

लोकोक्तियाँ (Lokoktiyan)

‘अ’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • अधजल गगरी छलकत जाए = अल्प सामर्थ्य वाला व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के बारे में बहुत डींग हाँकता है ।
  • अक्ल बड़ी कि भैंस = शारीरिक बल से बौद्धिक बल अधिक अच्छा होता है ।
  • अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है = अपने घर में, क्षेत्र में तो सब ज़ोर बताते हैं ।
  • अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता = समूह के द्वारा किया जा सकनेवाला कठिन कार्य अकेला व्यक्ति नहीं कर सकता ।
  • अटका बनिया देय उधार = स्वार्थी और मजबूर व्यक्ति अनचाहा कार्य भी करता है ।
  • अब पछताए क्या होत है जब चिड़ियाँ चुग गई खेत = हानि हो गई, हानि से बचने का अवसर चले जाने के बाद पश्चात्ताप करने से कोई लाभ नहीं ।
  • अरहर की टट्टी और गुजराती ताला = अनमेल प्रबंध व्यवस्था ।
  • अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग = अपनी मनमानी करना और एक-दूसरे के साथ तालमेल न रखना ।
  • अपना हाथ जगन्नाथ = स्वयं का काम स्वयं द्वारा ही संपन्न करना उपयुक्त है ।
  • अपना सोना खोटा तो परखैया का क्या दोष? = हम में ही कमज़ोरी हो तो बतानेवालों का क्या दोष ।
  • अपनी करनी पार उतरनी = अपना कार्य ही फलदायक होता है ।
‘आ’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • आम के आम गुठलियों के दाम = दुहरा फ़ायदा ।
  • आए थे हरिभजन को ओटन लगे कपास = बड़ा लक्ष्य निर्धारित कर छोटे कार्य में लग जाना ।
  • आधी छोड़ एक को ध्यावे, आधी मिले न सारी जावे = लोभ में सहज रूप से उपलब्ध वस्तु को भी त्यागना पड़ सकता है ।
  • आधा तीतर आधा बटेर = अनमेल योग ।
  • आग लगने पर कुआँ खोदना = विपत्ति आने पर उपाय खोजना शुरू करना ।
  • आगे नाथ न पीछे पगहा = पूर्णतः अनियंत्रित ।
  • आ बैल मुझे मार = जान बूझकर आफ़त मोल लेना ।
  • आग लगति झोंपड़ा जो निकले सो लाभ = व्यापक विनाश में जो कुछ बचाया जा सकता है वह लाभ ही है ।
  • आगे कुआँ पीछे खाई = दोनों ओर संकट ।
  • आसमान से गिरा खजूर में अटका = एक आपत्ति के बाद दूसरी आपत्ति का आ जाना ।
‘इ’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • इन तिलों में तेल नहीं = किसी भी लाभ की संभावना न होना ।
  • इमली के पात पर दंड पेलना = सीमित साधनों से बड़ा कार्य करने का प्रयास करना ।
  • इधर कुआँ उधर खाई = दोनों तरफ़ मुसीबत ।
‘ई’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • ईश्वर की माया, कहीं धूप कहीं छाया = संसार में व्याप्त भिन्नता ।
‘उ’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • उल्टे बाँस बरेली को = जहाँ जो चीज़ उपलब्ध हो, पैदा होती हो, उल्टे वहीं पर वह वस्तु पहुँचाना ।
  • उतर गई लोई तो क्या करेगा कोई = बेशर्म आदमी पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकता ।
  • उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे = दोषी का निर्दोष पर दोषारोपण करना ।
‘ऊ’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • ऊँट की चोरी और झुके-झुके = गुप्त न रह सकनेवाले कार्य को गुप्त ढंग से करने का प्रयास करना ।
  • ऊँची दुकान फीका पकवान = प्रदर्शन तो अधिक और सार की बात कम ।
  • ऊँट के गले में बिल्ली बाँधना = बेमेल, असंगत काम करना ।
  • ऊँट के मुँह में जीरा = आवश्यकता की तुलना में बहुत कम पूर्ति ।
  • ऊँट किस करवट बैठता है = ऐसी घटना की प्रतीक्षा जिसका अनुमान लगाना असंभव है ।
‘ए’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • एक आँख में रोवे, एक आँख में हँसे = दुःख का दिखावा व कपटपूर्ण व्यवहार ।
  • एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है = एक बदनाम व्यक्ति अपने साथ के सभी लोगों को बदनाम करवा देता है ।
  • एके साधे सब सधे = एक-एक करके कार्य करने पर क्रमशः सब कार्य ठीक होना ।
  • एक हाथ से ताली नहीं बजती = केवल एकपक्षीय सक्रियता से कार्य पूरा नहीं होता ।
  • एक पंथ दो काज = एक प्रयत्न से दो काम हो जाना ।
  • एक हाथ दे दूसरे हाथ ले = भलाई के बदले भलाई मिलना ।
  • एक अनार सौ बीमार = वस्तु की पूर्ति की तुलना में माँग अधिक होना ।
  • एक और एक ग्यारह होते हैं = संघ में बड़ी शक्ति है ।
  • एक तो चोरी ऊपर से सीना जोरी = ग़लती करना एवं ग़लती स्वीकार न कर उल्टे रोब दिखाना ।
  • एक म्यान में दो तलवारें नहीं आ सकतीं = एक ही स्थान पर दो समान वर्चस्व के प्रतिद्वंद्वी नहीं रह सकते ।
  • एक तो करेला (गिलोय) और दूसरा नीम चढ़ा = एक साथ दो-दो दोष,-प्रतिकूलताएँ ।
‘ऐ’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • ऐरे-गैरे नत्थू खैरे = अनुपयुक्त/बेकार सामर्थ्यहीन व्यक्ति ।
‘ओ’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • ओस चाटे प्यास नहीं बुझती = अल्प मात्रा में प्राप्ति से बड़ी आवश्यकता पूरी नहीं होती ।
  • ओछे के घर जाना, जनम-जनम का ताना = छोटा व्यक्ति किसी के लिए कोई काम करता है, करता भी है तो वह जीवनपर्यंत ताने भी देता रहता है ।
  • ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डरना = कठिन काम को हाथ में ले लेने पर आनेवाली बाधाओं से विचलित न होना ।
‘अं’ एवं ‘अँ’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • अंधे के आगे रोवे अपने भी नैन खोवे = अपात्र से मदद माँगने का व्यर्थ परिश्रम ।
  • अंधा क्या चाहे दो आँख = इच्छित वस्तु की प्राप्ति होना ।
  • अंधी पीसे कुत्ता खाय = मूर्ख की कमाई दूसरे ही खाते हैं ।
  • अंधेर नगरी चौपट राजा = कुप्रशासन और अजागरूक जनता ।
  • अंधे के हाथ बटेर लगना = बिना मेहनत के ही उपलब्धि होना ।
  • अंधों में काना राजा = अज्ञानियों में अल्पज्ञ भी बुद्धिमान माना जाता है ।
  • अंधे की लकड़ी = एक मात्र सहारा ।
  • आँख का अंधा नाम नयनसुख = गुणों के विपरीत नाम
  • आँख के आगे नाक, सूझे क्या ख़ाक = प्रत्यक्ष तथ्य भी दिखाई ना देना/यथार्थ स्थिति से अनभिज्ञ होना ।
  • आँख का अंधा गाँठ का पूरा = मूर्ख किंतु संपन्न ।
  • आँख और कान में चार अँगुल का फ़र्क होना = आँखों देखी सच कानों सुनी नहीं ।
  • आँख बची और माल यारों का = अपने सामान से थोड़ा-सा भी ध्यान हटा कि सामान की चोरी हो सकती है ।
‘क’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • क़ब्र में पाँव लटकाना = मरणासन्न व्यक्ति ।
  • कुत्ते की मौत मरना = बुरी मौत मरना ।
  • कै हंसा मोती चुगै, कै भूखा रह जाय = प्रतिष्ठित व्यक्ति अपनी मर्यादा में रहता है, स्वाभिमान नही छोड़ता ।
  • काम प्यारा है, चाम प्यारी नहीं = अपनी चिंता न कर कार्य के प्रति समर्पण ।
  • कमान से निकला तीर और मुँह से निकली बात वापस नहीं आती = सोच विचार कर बात करनी चाहिए क्योंकि बुरी बात कह देने पर उससे होनेवाले नुकसान से बचा नहीं जा सकता ।
  • कौआ चले हंस की चाल = किसी बुरे व्यक्ति द्वारा अच्छे व्यवहार का दिखावा करना ।
  • कोऊ नृप होइ हमें का हानी = किसी भी परिवर्तन के प्रति उदासीनता ।
  • काबुल में क्या गधे नहीं होते = कुछ-न-कुछ बुराई सब जगह होती है ।
  • कुएँ की मिट्टी कुएँ में ही लगती है = एक जगह की कमाई का वहीं पर खर्च होना ।
  • कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली = दो असमान सामर्थ्यवाले व्यक्तियों की तुलना ।
  • कोयले की दलाली में हाथ काले = बुरे कार्य से जुड़ने पर बुराई मिलती ही है ।
  • कागहि कहा कपूर चुगाए, स्वान न्हवाए गंग = दुर्जन की प्रकृति खूब प्रयत्न करने पर भी नहीं बदलती ।
  • कही खेत की, सुनी खलियान की = कुछ का कुछ सुनना ।
  • कंगाली में आटा गीला = अभाव में भी अभाव ।
  • कभी नाव गाड़ी पर, कभी गाड़ी नाव पर = स्थितियों का एकदम विपरीत एव सकारात्मक परिवर्तन ।
  • काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती = झूठ बार-बार नहीं चलता ।
  • कागज़ की नाव नहीं चलती = छद्मपूर्ण बात बहुत दिनों तक नहीं टिकती ।
  • कानी के ब्याह में कौतुक ही कौतुक = किसी दोष से युक्त होने पर कठिनाइयाँ आती ही रहती हैं
  • कभी घी घना, कभी मुट्ठी भर चना = समय समान नहीं रहता कभी नफ़ा हो जाता है तो कभी नुकसान भी, इसलिए जो मिले उसी में संतुष्ट रहना चाहिए ।
  • कर सेवा, खा मेवा = अच्छा काम करने का परिणाम अच्छा ही निकलता है ।
  • काला अक्षर भैंस बराबर = अनपढ़ होना ।
  • का वर्षा जब कृषि सुखाने = हानि हो चुकने के बाद उपचार करने से क्या लाभ ।
  • करमहीन खेती करे, बैल मरे या सूखा पड़े = समय ख़राब हो तो किसी-न-किसी प्रकार का नुकसान होता ही है ।
  • कुत्ता भी दुम हिलाकर/घुमाकर बैठता है = सफ़ाई सभी को पसंद होनी चाहिए ।
  • कर ले सो काम और भज ले सो राम = समय पर जो कर लिया जाए वही अपना है ।
  • कुत्ते की दुम बारह बरस नली में रखो तो भी टेढ़ी की टेढ़ी = दुष्ट दुष्टता नहीं छोड़ता बुरी प्रकृतिवाला व्यक्ति अपना बुरा स्वभाव नहीं छोड़ता ।
  • ककड़ी-चोर को फाँसी की सज़ा नहीं दी जा सकती = छोटे से अपराध के लिए बड़ा दंड उचित नहीं ।
‘ख’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • खेल खिलाड़ी का, पैसा मदारी का = काम कोई करे और लाभ कोई उठाए ।
  • ख़रबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है = एक को देखकर दूसरे में परिर्वतन आता है ।
  • खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे = असफलता से लज्जित होकर क्रोध करना ।
  • ख़ुशामद से ही आमद है = चापलूसी करके ही उपलब्धि हासिल करने की सोच रखना ।
  • खरी मजूरी चोखा काम = पारिश्रमिक सही देने पर काम भी अच्छा होता है ।
  • शोदा पहाड़ और निकली चुहिया = अधिक परिश्रम पर लाभ कम ।
  • खूँटी के बल बछड़ा कूदे = दूसरे के बल पर अपना बल दिखाना ।
  • खाई खोदे और को, ताको कूप तैयार = दूसरों के लिए बुरा करनेवालों का परिणाम और भी ज़्यादा बुरा होता है ।
  • खग जाने खग ही की भाषा = सब अपने-अपने संपर्क के लोगों का हाल समझते है ।
  • खोटा बेटा और खोटा पैसा भी समय पर काम आता है = अनुपयोगी व्यक्ति या वस्तु भी कभी-न-कभी उपयोगी बन ही जाता है ।
  • खाली बनिया क्या करे, इस कोठी का धान उस कोठी में करना = निठल्ला व्यक्ति कुछ-न-कुछ काम करने में सक्रियता दिखाता रहता है ।
  • खुदा गंजे को नाख़ून नहीं देता = अनधिकारी एवं दुर्भावी व्यक्ति को अधिकार नहीं मिलता ।
‘ग’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • गंगा गए गंगादास, जमुना गए जमुनादास। = सिद्धांतहीन, अवसरवादी व्यक्ति ।
  • गुड़ खाए मर जाए तो ज़हर देने की क्या ज़रूरत = यदि शांतिपूर्वक ही कोई कार्य हो जाए तो कठोर व्यवहार की आवश्यकता नहीं ।
  • ग़रीबों ने रोज़े रखे तो दिन बड़े हो गए = कमज़ोर कोई अच्छा प्रयत्न भी करे तो कोई-न-कोई बड़ा संकट आ ही जाता है ।
  • गुरु गुड़ ही रह गया, चेला शक्कर हो गया = गुरु की तुलना में चेले का अधिक प्रगति करना ।
  • ग़रीब की जोरू सब गाँव की भौजाई = कमज़ोर व्यक्ति का लाभ सब उठाते हैं ।
  • गुड़ न दे पर गुड़ की सी बात तो करे = यदि किसी की मदद नहीं की जा सके तो कम से कम मधुर व्यवहार तो देना चाहिए ।
  • गोद में छोरा, शहर में ढिंढोरा = पास होने पर भी अज्ञानवश दूर-दूर तक तलाशना ।
  • गाय को अपने सींग भारी नहीं लगते = अपने लोगों की ज़िम्मेदारी कष्टकारी नहीं होती ।
  • गेहूँ के साथ घुन भी पिसता है = दोषी की संगति से निर्दोष भी दंडित हो जाता है ।
  • गए रोजा छुड़ाने नमाज़ गले पड़ी = छोटा सुख प्राप्त करने के प्रयत्न में बड़ा दुःख झेलना ।
‘घ’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • घर की मुर्ग़ी  दाल बराबर = सहज सुलभ वस्तु का कोई महत्त्व नहीं होता ।
  • घर का भेदी लंका ढाए = घर का रहस्य जाननेवाला बड़ी हानि पहुँचा सकता है ।
  • घोड़े की दुम बढ़ेगी तो अपनी ही मक्खियाँ उड़ाएगा = तुच्छ व्यक्ति अपनी सामर्थ्य बढ़ाएगा तो उससे अपना ही भला करेगा ।
  • घोड़े को लात, आदमी को बात = दुष्ट के साथ कठोरता पूर्ण और सज्जन से नम्रता का व्यवहार ।
  • घर में नहीं दाने, बुढ़िया चली भुनाने = अभाव होने पर भी झूठा दिखावा करना ।
  • घर खीर तो बाहर खीर = घर में संपन्नता और सम्मान है तो बाहर के लोगों से भी यही मिल जाता है ।
  • घर आया नाग न पूजिए, बाम्बी पूजन जाय = स्वतः आए सुअवसर का लाभ न उठाकर फिर उसको प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करना ।
  • घर का जोगी जोगना आन गाँव का सिद्ध = परिचितों की अपेक्षा दूर के अपरिचितों को अधिक महत्त्व दिया जाता है ।
  • घर का न घाट का = न इधर का न उधर का, कहीं का नहीं ।
  • घी सँवारे काम, बड़ी बहू का नाम = अच्छे परिणाम का कारण तो कुछ और हो और यश किसी और को मिले ।
  • घोड़ा घास से यारी करे तो खाए क्या = यदि निर्वाह के लिए भी कमाई करने में लिहाज़ बरता जाए तो जीवन कैसे चलेगा ।
  • घायल की गति घायल जाने = एक पीड़ा से गुज़रा हुआ व्यक्ति ही दूसरे की पीड़ा को समझ सकता है ।
‘च’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • चिराग तले अँधेरा होना = अपने नज़दीकी व्यक्ति के अवगुण न देख पाना ।
  • चंद्रमा को भी ग्रहण लगता है = भले लोगों के भी बुरे दिन आ सकते हैं ।
  • चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरी रात = थोड़े समय का सुख, अधिक समय का दुःख ।
  • चोर से कहे चोरी कर शाह से कहे जागता रह/चोर को कहे लाग साहूकार को कहे जाग = दोनों विरोधी पक्षों से संपर्क रखने की चालाकी ।
  • चोर-चोर मौसेरे भाई = दुष्ट लोगों में आपस में घनिष्ठता होती है ।
  • चट मँगनी पट ब्याह = शीघ्रता से अच्छा कार्य संपन्न हो जाना।
  • चोर की दाढ़ी में तिनका = दोषी अपने व्यवहार में ही दोष करने का संकेत दे देता है ।
  • चिकना मुँह पेट खाली = दिखने में संपन्नता पर वास्तव में अभाव।
  • चुपड़ी और दो-दो = अच्छी चीज़ और वह भी बहुतायत में ।
  • चोरन कुतिया मिल गई पहरा किसका देय = जब रक्षक ही चोरों से मिल गया तो फिर ऐसे व्यक्ति से रक्षा करवाने का कोई अर्थ नहीं ।
  • चंदन विष व्यापै नहीं लिपटे रहत भुजंग = भले लोगों पर बुरों की संगति का असर नहीं पड़ता ।
  • चिकने घड़े पर पानी नहीं ठहरता = बेशर्म पर कोई अच्छा असर नहीं होता ।
  • चंदन की चुटकी भली गाड़ी भरा न काठ = उपयुक्त गुणवाली वस्तु तो थोड़ी-सी भी अच्छी है और गुणरहित वस्तु अधिक मात्रा में भी निरर्थक है ।
‘छ’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • छोटा मुँह बड़ी बात = सामर्थ्य से अधिक के बारे में डींग मारना ।
  • छछूंदर के सर में चमेली का तेल = अयोग्य व्यक्ति द्वारा स्तरीय वस्तु का उपयोग ।
‘ज’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • जिन ढूँढ़ा  तिन पाइया गहरे पानी पैठ = जो संकल्पशील होते हैं वे कठिन परिश्रम करके अपने लक्ष्य को प्राप्त कर ही लेते हैं ।
  • जितनी चादर हो, उतना ही पैर पसारो = सामर्थ्य के अनुसार खर्च करना ।
  • जान बची लाखों पाए = जीवन धन से अधिक मूल्यवान है ।
  • जितनी डफली उतने राग = जितने लोग, उतने विचार ।
  • जहाँ फूल वहाँ काँटा = जहाँ अच्छाई होती है वहीं बुराई भी होती है ।
  • जैसे साँपनाथ वैसे नागनाथ = दोनों ही एक-जैसे बुरे ।
  • जिसकी लाठी उसकी भैंस = शक्तिशाली की ही संपत्ति है ।
  • जहाँ गुड़ होगा वहाँ मक्खियाँ होंगी = जहाँ-जहाँ लाभ प्राप्त होने का आकर्षण होगा वहाँ-वहाँ लोग पहुँचेंगे ही ।
  • जब तक साँस, तब तक आस = अंतिम क्षण तक जीवन की आशा बनी रहती है ।
  • जाकै पैर न फटे बिवाई वह क्या जाने पीर पराई = स्वयं दुःख भोगे बिना दूसरे की पीड़ा का आभास नहीं हो सकता ।
  • जो गरजते हैं, वो बरसते नहीं = झूठी और बड़ी-बड़ी बातें करने वाले वास्तव में काम नहीं करते ।
  • जल में रहकर मगर से बैर = अपने से अधिक शक्तिशाली से दुश्मनी बढ़ाना।
  • जस दूल्हा तस बनी बराता = जैसा मुखिया वैसे ही अन्य साथी ।
  • जैसी करनी वैसी भरनी = कर्मानुसार फल प्राप्ति ।
  • जैसा देश वैसा भेष = स्थान एवं अवसर के अनुसार व्यवहार करना ।
  • जैसा राजा वैसी प्रजा = मुखिया जैसा होगा अनुयायी भी वैसे ही होंगे ।
  • ज्यों-ज्यों भीगे कामरी त्यों-त्यों भारी होय = समय के साथ-साथ ज़िम्मेदारियाँ भी बढ़ती जाती हैं ।
  • जितना गुड़ डालोगे उतना ही मीठा होगा = जितना अधिक त्याग करोगे उतना ही अधिक प्राप्त करोगे ।
‘झ’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • झूठहि लेना झूठहि देना, झूठहि भोजन झूठ चबैना = हर कार्य में बेईमानी ही करना ।
  • झूठ के पैर नहीं होते = झूठ अधिक दिन नहीं चल सकता ।
‘ट’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • टके के लिए मस्ज़िद तोड़ना = छोटे से स्वार्थ के लिए बड़ा नुकसान करना ।
  • टके की चटाई, नौ टका विदाई = लाभ से ज़्यादा खर्च करना ।
  • टके की मुर्गी नौ टके वसूल = किसी वस्तु का बहुत अधिक मूल्य प्राप्त करना ।
  • टके की हाँडी गई, कुत्ते की जात पहचानी गई = स्वयं का थोड़ा नुकसान सहनकर भारी नुकसान करने वाले चरित्र को पहचान लेना ।
  • टके का सब खेल = धन से सब काम संपन्न होते हैं ।
‘ठ’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • ठंडा लोहा गरम लोहे को काट देता है = शांत व्यक्ति, अंततः क्रोधी पर विजय पाता है ।
  • ठोकर लगी पहाड़ की, तोड़े घर की सिल = अपने से बलवान पराए व्यक्ति से अपमानित होकर स्वजनों पर गुस्सा निकालना ।
  • ठोक बजा ले चीज़, ठोक बजा दे दाम = अच्छी गुणवत्तावाली वस्तु लेना तथा उसका मूल्य भी अधिक चुकाना ।
  • ठोकर लगे तब आँख खुले = कुछ नुकसान होने पर ही कुछ सीखा जाता है ।
‘ड’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • डायन को दामाद प्यारा = बुरे को भी अपना व्यक्ति प्यारा होता है ।
  • डंडा सबका पीर = सख़्ती से अनुशासन है ।
  • डायन भी अपने बच्चे नहीं खाती = दुष्ट व्यक्ति भी अपना नुकसान नहीं करता ।
‘ढ’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • ढाक के तीन पात = एक-सा रहना।
‘त’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • तिरिया तेल हमीर-हठ चढ़े न दूजी बार = कुछ चीजें ठान लेने पर पूरी करनी ही होती है ।
  • तिनके की ओट में पहाड़ = छोटी चीज़ के पीछे बड़े रहस्य का छिपा होना ।
  • तीन लोक से मथुरा न्यारी = सबसे अलग स्थिति ।
  • शीघ्र दिवस महा कल्याण = शुभ कार्य करते ही तुरंत अच्छा फल प्राप्त होना ।
  • तेल न मिठाई, चूल्हे धरी कड़ाही = बिना पूर्व तैयारी के काम शुरू करना ।
  • तीरथ गए मुँडाए सिर = वातावरण के अनुसार निर्णय लेना ।
  • तेल देखो तेल की धार देखो = किसी भी स्थिति का धैर्यपूर्वक आकलन करना ।
  • तेते पाँव पसारिए जेती लम्बी सौर = अपनी सामर्थ्य के अनुसार व्यय करना ।
  • तू डाल-डाल, मैं पात-पात = एक चालाक से बढ़कर दूसरा चालाक ।
  • तीन में न तेरह में = जिसका कुछ भी महत्त्व न हो ।
  • तबेले की बला बंदर के सिर = किसी पर अन्य का दोष मढ़ देना ।
  • तलवार का घाव भरता है पर बात का नहीं भरता = कटु वाक्य हृदय पर घाव करते हैं ।
‘थ’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • थोड़ी पूँजी धणी को खाय = अपर्याप्त पूँजी से व्यापार में घाटा होता है।
  • थूक से सत्तू सानना = कम सामग्री से बड़ा काम पूरा करने की असफल कोशिश करना ।
  • थका ऊँट सराय ताकता है = थके को विश्राम की ज़रूरत होती है।
  • थोथा चना बाजे घना = अकर्मण्य बात अधिक करता है ।
  • थूक कर चाटना = अपनी बात से फिर जाना।
‘द’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • दीवारों के भी कान होते हैं = गोपनीय बातचीत बहुत सावधानी से करनी चाहिए क्योंकि उस बात की औरों के ज्ञात हो जाने की संभावना बनी रहती है।
  • दबी बिल्ली चूहों से भी कान कटवाती है = किसी से दबा हुआ आदमी अपने से कमज़ोर लोगों के भी वश में रहता है ।
  • दाख पके तब काग के होय कंठ में रोग = किसी वस्तु का उपभोग करने की स्थिति में आने पर उसका उपभोग कर सकने में असमर्थ हो जाना ।
  • दलाल का दीवाला क्या, मस्ज़िद में ताला क्या ? = जिसके पास खोने को कुछ भी नहीं है, उसे हानि से डर क्या ?
  • दुधारू गाय की लात भी अच्छी = जो व्यक्ति लाभकारी है उससे थोड़ा-बहुत नुक़सान भी सहन कर लेना उचित है ।
  • दूध का जला छाछ को फूँक-फूँक कर पीता है = एक बार धोखा खाया हुआ व्यक्ति आगे सतर्क हो जाता है ।
  • दाने-दाने पर मुहर = अपना-अपना भाग्य ।
  • दुविधा में दोनों गए माया मिली न राम = दुविधाग्रस्त व्यक्ति को किसी की भी प्राति नहीं होती ।
  • दबाने पर चींटी भी चोट करती है = सीमा से अधिक परेशान करने पर छोटे-से-छोटा व्यक्ति भी बदला ले सकता है ।
  • दो लड़े, तीसरा ले उड़े = दो के झगड़े में तीसरे की बन आती है।
  • दाग लगाए लँगोटिया यार = मनुष्य धोखा अपनों से ही खाता है ।
  • दाल-भात में मूसलचंद  = अवांछित एवं अनुचित हस्तक्षेप करना ।
  • दूध का दूध पानी का पानी = सही न्याय करना, सही को सही और ग़लत को ग़लत बताना ।
  • दान की बछिया के दाँत नहीं गिने जाते = मुफ़्त में मिली काम की वस्तु में कमियाँ नहीं देखी जाती ।
  • दादा कहने से बनिया भी गुड़ देता है = मधुर वाणी से सब काम बन जाते हैं ।
‘ध’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • धनवंती को काँटा लगा, दौड़े लोग हज़ार = धनी के कष्ट में बहुत लोग सहायता के लिए आ जाते हैं ।
  • धक डाले चाँद नहीं छुपता = सज्जन की निंदा से उसकी सज्जनता छिपती नहीं ।
  • धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का = जो दो भिन्न पक्षों से जुड़ा रहता है वह कहीं का नहीं रहता का नहीं रहता ।
‘न’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • नाम बड़े और दर्शन छोटे = गुणों से ज्यादा प्रसिद्धि बतलाना ।
  • नाक कटी पर घी तो चाटा = बेइज्ज़त होकर कुछ पाना।
  • नीचे की साँस नीचे, ऊपर की साँस ऊपर = संकट में घबरा जाना ।
  • नया नौ दिन पुराना सौ दिन = नया, नया है पुराना सोना है ।
  • नदी-नाव संयोग = क्षणिक साथ ।
  • नौ नक़द न तेरह उधार = यदि लाभ शीघ्र मिल रहा हो तो वह बाद में मिलनेवाले अधिक लाभ की तुलना में अच्छा है ।
  • न सावन सूखा, न भादो हरा = हर परिस्थिति में एक-सा बना रहना ।
  • न ऊधो का लेना न माधो का देना = किसी से कोई मतलब नहीं होना ।
  • नटनी जब बाँस पर चढ़ी तब घूँघट क्या = बेशर्म होने पर लज्जा का कोई स्थान नहीं ।
  • नेकी और पूछ-पूछ = शुभ कार्य करने के लिए क्या पूछना।
  • नक्कारख़ाने में तूती की आवाज़ = बड़ों के बीच में छोटे आदमी की कौन सुनता है ।
  • नौ दिन चले अढ़ाई कोस/दिनभर चले अढ़ाई कोस = बहुत सुस्ती से काम करना ।
  • न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी = किसी समस्या के मूल कारण को ही नष्ट कर देना।
  • नीम (अधूरा) हक़ीम ख़तरे जान = अज्ञानी एवं अनुभवहीन की राय ख़तरनाक होती है ।
  • निर्बल के बल राम = असहाय की ताकत ईश्वर ही होता है ।
  • न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी = किसी कार्य को करने के लिए अव्यावहारिक शर्त लगाना ।
  • नाच न जाने आँगन टेढ़ा = अपनी अयोग्यता के लिए साधनों को दोष देना ।
‘प’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • पकायी खीर पर हो गयी दलिया = भाग्य का साथ न देना ।
  • पाँव उखड़ना = कमज़ोर पड़ना ।
  • पाँचों अँगुलियाँ घी में हैं = पूरी तरह से संपन्नता ।
  • पढ़े फ़ारसी बेचे तेल, यह देखो कुदरत का खेल = योग्यता होने पर भी दुर्भाग्य से योग्यतानुसार काम न मिलना ।
  • पाप का घड़ा भरकर डूबता है = पाप जब बहुत अधिक बढ़ जाता है, तब विनाश होता है।
  • पानी पीकर जात पूछना = काम समाप्ति पर उसके सभी पहलुओं पर विचार करना ।
  • प्यासा कुएँ के पास जाता है, कुआँ प्यासे के पास नहीं = जिसका काम है उसे अपना काम करवाने के लिए काम करनेवाले के पास जाना पड़ता है ।
  • पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं = पराधीनता में सुख कहाँ ?
  • पाँचों अँगुलियाँ बराबर नहीं होती = सब इंसान एक समान नहीं होते ।
  • पावभर चून पुल भर रसोई = कम भोजन पर अधिक लोगों को बुलाना ।
‘प्र’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • प्रभुता पाहि काहि मद नाहिं = उच्च पद प्राप्त करके किसे घमंड नहीं होता ।
‘फ’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • फलेगा सो झड़ेगा = सुख के बाद दुःख अवश्यम्भावी है ।
  • फिसल पड़े तो हर-हर गंगे = काम बिगड़ जाने पर यह कहना कि यह तो किया ही ऐसे गया था ।
  • फरा सो झरा, बरा सो बुताना = जो फला है सो झड़ेगा, जो जला है सो बुझेगा, अर्थात् सभी लोग अपने अंत को प्राप्त होते हैं ।
‘ब’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न भीख = माँगने पर तुच्छ वस्तु देने से भी कोई इंकार कर सकता है और बिना माँगे कोई बहुमूल्य भी दे सकता है ।
  • बासी बचे न कुत्ता खाय = ज़रूरत भर का काम करना ।
  • बनिया मीत, न वेश्या सती = वेश्या कभी चरित्रवान नहीं होती व व्यापारी किसी का मित्र नहीं हो सकता ।
  • बैठे से बेगार भली = निरर्थक बैठे रहने के बजाय कम लाभ के लिए भी कुछ-न-कुछ काम करना ।
  • बाड़ ही जब खेत को खाए तो रखवाली कौन करे ? = रक्षक ही भक्षक हो जाए ।
  • बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से होय = बुरा काम करने पर अच्छा नतीजा कैसे प्राप्त हो सकता है ।
  • बड़े बरतन की खुरचन भी बहुत है = जहाँ बहुत ज्यादा धन होता है वहाँ घटता-घटता भी पर्याप्त रह जाता है ।
  • बाँझ क्या जाने प्रसव की पीड़ा ? = जिसने कष्ट नहीं देखा, वो दूसरों का कष्ट क्या जाने ।
  • बाँबी में हाथ तू डाल और मंत्र मैं पहूँ = चालाकी से दूसरे को ख़तरे में डालना ।
  • बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद = मूर्ख किसी अच्छी वस्तु की कद्र नहीं कर सकता ।
  • बूढ़े तोते भी कभी पढ़ते हैं ? = बुढ़ापे में कुछ सीखना कठिन हो जाता है ।
  • बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपय्या = आज के युग में धन ही सब कुछ है ।
  • बकरे की माँ कब तक खै़र मनाएगी ? = जिसका कष्ट पाना तय है वह अंतत: विपत्ति में पड़ेगा ही ।
  • बिल्ली के भाग से छींका टूटा = बिना प्रयास किए किसी अयोग्य व्यक्ति को फल प्राप्त हो जाना ।
‘भ’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • भेड़ पर ऊन कोई नहीं छोड़ता = जो कमज़ोर है उसका हर कोई शोषण कर लेता है ।
  • भीख माँगे आँख दिखावै = असमर्थ होकर अकड़ना ।
  • भूखे भजन न होय गुपाला = भूखे रहने पर कोई काम नहीं हो सकता ।
  • भैंस के आगे बीन बजाना = मूर्ख व्यक्ति को उपदेश देना निरर्थक होता है ।
  • भौंकते कुत्ते को रोटी का टुकड़ा = जो विरोध करे उसे लाभ देकर चुप करना ।
  • भागते चोर की लँगोटी ही सही = जिससे कुछ न मिलता हो उससे कुछ भी पा लेना अच्छा है ।
  • भरी गगरिया चुपके जाय = ज्ञानी गंभीर होता है ।
‘म’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • मुद्दई सुस्त, गवाह चुस्त = पीड़ित व्यक्ति का निष्क्रिय रहना ।
  • मानो तो देव, नहीं तो पत्थर = किसी के प्रति विश्वास हो तभी उसके प्रति आस्था पैदा होती है ।
  • मेरी बिल्ली मुझ ही से म्याऊँ ? = मालिक के सामने नौकर का अकड़ना ।
  • मुख में राम बगल में छुरी = अच्छे व्यवहार का प्रदर्शन किंतु धोखा देने की नीयत ।
  • मन चंगा तो कठौती में गंगा = मन की पवित्रता ही महत्त्वपूर्ण है ।
  • मन के लड्डुओं से पेट नहीं भरता = केवल कल्पना कर लेने से तृप्ति नहीं होती ।
  • मुल्ला की दौड़ मस्ज़िद तक = सीमित सामर्थ्य होना ।
  • मान न मान मैं तेरा मेहमान = अवांछित रूप में किसी के गले पड़ना ।
  • मन की मन में रह जाना = इच्छा पूरी न होना ।
  • मेंढ़की को जु़काम = मामूली आदमी द्वारा अपनी क्षमता का काम करने में भी नखरे करना ।
‘य’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • यह मुँह और मसूर की दाल = सामर्थ्य से बढ़कर बात या काम करना ।
  • यथा राजा तथा प्रजा = जैसा नेता वैसी जनता ।
  • योगी था सो उठ गया, आसन रही भभूत = पुरानी ख़्याति समाप्त होना ।
‘र’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • रामनाम जपना पराया माल अपना = ऊपर से ईमानदार अंदर से ठग ।
  • रस्सी जल गई पर बल नहीं गया = प्रतिष्ठा समाप्त हो जाने पर भी दंभ की बू शेष रहना ।
  • राम की माया कहीं धूप कहीं छाया = प्रकृति के अनेक रूप एक ही समय में दिखाई देना ।
‘ल’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • लंका में सब बावन गज के = एक से बढ़कर एक ।
  • लेना एक न देना दो = किसी से कुछ व्यवहार न रखना ।
  • लिखित सुधाकर (चंद्रमा) लिखिगा राहू = कोई अच्छी उपलब्धि के योग्य हो किंतु दुर्योग से परिणाम बुरा भोगना पड़े ।
  • लिखे ईसा पढ़े मूसा = न पढ़ने योग्य लिखावट।
‘व’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • विष दे पर विश्वास न दे = किसी को स्पष्ट कहकर उसका बुरा कर दीजिए किंतु विश्वासघात मत कीजिए ।
  • विनाश काले विपरीत बुद्धि = आदमी का प्रतिकूल समय आने पर उसका विवेक भी जाता रहता है ।
‘श’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • शेखी सेठ की, धोती भाड़े की = ज्ञान/धन न होने पर भी बड़प्पन दिखाना ।
‘स’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • सौ-सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज को = जीवन भर पाप करके अंत में धर्मात्मा बनने का ढोंग करना ।
  • सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है = सुख-सुविधाओं में पैदा होनेवाले को दुनिया में कोई कष्ट नज़र नहीं आता ।
  • समय पाय तरुवर फले = निरंतर परिश्रम करने से सही समय पर सफलता अवश्यमिलती है ।
  • सूरदास की काली कामरी चढ़े ने दूजो रंग = स्वभाव कभी बदलता नहीं, आदतें इतनी पक्की होती हैं कि वो बदलती नहीं ।
  • सहज पके सो मीठा होय = समुचित समय लेकर किया जानेवाला कार्य अच्छा होता है ।
  • साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे = बिना किसी नुकसान के लक्ष्य प्राप्त करना ।
  • सूत न कपास, जुलाहे से लट्ठम लट्ठ = बिना आधार (कारण) किसी से झगड़ा करना ।
  • साझे की हाँडी चौराहे पर फूटती है = साझेदारी जब समाप्त होती है तो सबके सामने उजागर होती है ।
  • सखी न सहेली, भली अकेली = एकांत में रहना ।
  • सब धान बाईस पंसेरी = अज्ञानी के लिए अच्छी बुरी सब चीज़े एक समान ।
  • साँप छछूँदर की गति होना = दुविधा में पड़ना ।
  • सावन हरे न भादो सूखा = हमेशा एक जैसा रहना ।
  • समय चूकि पुनि का पछिताने = अवसर बीत जाने पर फिर पछताने से क्या होता है ।
  • सेर को सवा सेर = एक से बढ़कर एक ।
‘ह’ से शुरू होने वाली लोकोक्तियाँ
  • हंसा था सो उड़ गया, कागा भया दीवान = भले लोगों के स्थान पर बुरे लोगों के हाथ में सत्ता (अधिकार) आना ।
  • हाथी के दाँत दिखाने के और, खाने के और = कथनी और करनी में अंतर
  • होनहार बिरवान के होत चीकने पात = प्रतिभाशाली का प्रभाव स्वतः ही दिख जाता है ।
  • हाथ कंगन को आरसी क्या = प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं ।
  • हज़ारों टाँकियाँ सहकर महादेव बनते हैं = कष्ट सहन करने से ही सम्मान मिलता है ।
  • हथेली पर सरसों नहीं उगता = प्रत्येक कार्य बिना एक प्रक्रिया और समय के पूर्ण नहीं होता ।
Notes (नोट्स) MCQs (बहुविकल्पीय प्रश्न)

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