राजस्थान की भूमि केवल अपने विशाल किलों, शूरवीरों और रेतीले धोरों के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि अपने अत्यंत समृद्ध और गहरे सामाजिक रीति-रिवाजों के लिए भी पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यहाँ का सामाजिक जीवन आज भी अपनी सदियों पुरानी परंपराओं से भरा पड़ा है। राजस्थान के इन सामाजिक रीति-रिवाजों को मुख्य रूप से चार प्रमुख भागों में बाँटा गया है: जन्म से सम्बंधित, विवाह से सम्बंधित, शोक से संबंधित और अन्य ऐतिहासिक प्रथाएं।
आइए, एक व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक निभाए जाने वाले इन सतरंगी और मार्मिक संस्कारों को विस्तार से और सरल भाषा में समझते हैं।
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1. जन्म से सम्बंधित रीति-रिवाज (जीवन का आरम्भ)
एक मनुष्य के जीवन में कुल सोलह (16) संस्कार माने जाते हैं, जिनकी शुरुआत जन्म से भी पहले हो जाती है। राजस्थान में शिशु के जन्म और उसके बचपन से जुड़ी कई अद्भुत रस्में हैं:
- गर्भाधान, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन: जीवन की शुरुआत गर्भाधान संस्कार से होती है जिसे स्त्री के गर्भवती होने पर घर में उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इसके बाद गर्भस्थ शिशु को पुत्र रूप देने की कामना के लिए ‘पुंसवन’ संस्कार किया जाता है। गर्भ में बच्चे को सुरक्षित रखने के लिए ‘सीमन्तोन्नयन’ संस्कार किया जाता है, जिसे मारवाड़ क्षेत्र में ‘अग्रणी’ भी कहा जाता है।
- जातकर्म और जन्मोत्सव: शिशु के जन्म के तुरंत बाद जातकर्म होता है, जिसमें शिशु को सोने की सलाई से शहद और घी चटाया जाता है। जन्मोत्सव के अवसर पर घर की वृद्ध महिलाओं द्वारा काँसे की थाली बजाई जाती है (मुख्य रूप से लड़के के जन्म पर)। इस दौरान जच्चा (माँ) को धन्यवाद देने और बच्चे की सुख-समृद्धि के लिए ‘जच्चा होलर’ नामक लोकगीत गाया जाता है।
- नामकरण और छठी पूजन: बच्चे के जन्म से जुड़े इस संस्कार में उसका नाम रखा जाता है। जन्म के छठे दिन ‘छठपूजन’ होता है; मान्यता है कि इस दिन विधाता बालक का भाग्य लिखते हैं।
- आख्या और न्हाण: जन्म के आठवें दिन बहन और बेटियों द्वारा घर के दरवाजे पर साटिया (स्वास्तिक चिह्न) लगाया जाता है जिसे ‘आख्या’ कहते हैं। जच्चा और बच्चे का जो प्रथम स्नान होता है, उसे ‘न्हाण’ कहा जाता है।
- कुआँ पूजन (जलवा पूजन): यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण रस्म है जो बालक के जन्म के 21वें दिन की जाती है। इस दिन माता कुआँ पूजने जाती है।
- जामणा और ढूँढ: बालक के ननिहाल पक्ष के लोग खुशी में उपहार, कपड़े, मिठाई और माँ के लिए पीला वस्त्र लेकर आते हैं, जिसे ‘जामणा’ कहते हैं। जन्म के बाद आने वाली प्रथम होली पर ननिहाल पक्ष की ओर से जो कपड़े और उपहार भेजे जाते हैं, उसे ‘ढूँढ’ कहा जाता है।
- निष्क्रमण और अन्न प्राशन: बच्चे को चौथे महीने में पहली बार घर से बाहर निकाला जाता है (निष्क्रमण) और छठे महीने में पहली बार उसे अन्न खिलाया जाता है जिसे ‘अन्न प्राशन’ कहते हैं।
- मुण्डन (चूड़ाकर्म/जड़ूला/लटरिया): बच्चे के जन्म के पहले या तीसरे वर्ष में पहली बार उसके सिर के बाल उतारे जाते हैं।
- यज्ञोपवीत (जनेऊ/उपनयन): यह संस्कार बालक को विद्यारम्भ हेतु गुरु के पास ले जाने के समय किया जाता है, जो मुख्य रूप से 10-11 वर्ष की आयु में होता है। जनेऊ धारण करने का सबसे उत्तम दिन रक्षाबंधन को माना जाता है।
विशेष तथ्य: नवजात बच्चे को बीमारियों से बचाने के लिए भी कई मान्यताएँ हैं। निर्विघ्न प्रसव और सूखे रोग से बचाव के लिए मावलिया या महामाया की पूजा की जाती है, जबकि चेचक जैसी बीमारी से बचाने के लिए शीतलामाता की पूजा होती है। इसके अलावा बेटी का पहला प्रसव होने पर उसके पीहर वालों द्वारा जंवाई और संबंधियों को जो भेंट दी जाती है, उसे ‘कोथला’ कहते हैं।
2. विवाह से सम्बंधित रीति-रिवाज (नए जीवन का बंधन)
राजस्थान में विवाह केवल दो लोगों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और गाँवों का मिलन होता है। इसकी रस्में बेहद लंबी और मनोरंजक होती हैं:
- सगाई और टीका: विवाह पक्का करने के लिए लड़के या लड़की को रोका जाता है (एक रुपया और नारियल देकर), जिसे सगाई कहते हैं। वागड़ क्षेत्र में इसे ‘टेवलिया’ या ‘सगपण’ भी कहते हैं। वधू पक्ष की ओर से वर को तिलक करके जो भेंट दी जाती है, वह ‘टीका’ कहलाता है।
- लग्न पत्रिका और कुमकुम पत्रिका: वधू पक्ष वाले पंडित से विवाह का कार्यक्रम लिखवाकर जो पत्रिका वर पक्ष को भेजते हैं, उसे लग्न पत्रिका या ‘पीली चिट्ठी’ कहते हैं। विवाह का पहला निमंत्रण पत्र भगवान गणेश जी को भेजा जाता है, जिसे ‘कुमकुम पत्रिका’ कहा जाता है।
- तैयारियाँ (इकताई और कंकण-डोरा): दर्जी द्वारा वर-वधू के कपड़े बनाने के लिए जो नाप लिया जाता है उसे ‘इकताई’ कहते हैं। विवाह से दो दिन पहले दूल्हे और दुल्हन के दाहिने हाथ (मोली) में तांबा, लोहा, लौंग और कौड़ी बाँधकर सात गांठें लगाई जाती हैं, जिसे ‘कंकण-डोरा’ कहते हैं।
- बान बैठना और बिंदोली: कंकण-डोरा बांधने के बाद की रस्म ‘बान बैठना’ कहलाती है। विवाह से ठीक एक दिन पूर्व संध्या को वर या वधू को गाजे-बाजे के साथ मोहल्ले में घुमाया जाता है, जिसे ‘बिंदोली’ कहते हैं (झालावाड़ का बिंदोली नृत्य प्रसिद्ध है)।
- बड़ला-पड़ला और सामेला: दुल्हन के लिए लाये जाने वाले आवश्यक सामान को ‘बरी-पड़ला’ कहते हैं। जब वर पक्ष बारात लेकर पहुँचता है, तो वधू पक्ष कलश में नारियल रखकर उनका स्वागत करता है, जिसे ‘सामेला’ या ‘मधुपर्क’ कहते हैं।
- तोरण मारना: दूल्हा जब वधू के घर के दरवाजे पर पहुँचता है, तो वह घोड़ी पर बैठकर तलवार या कटार से दरवाजे पर लगे तोरण को सात बार मारता है।
- हथलेवा और फेरे: चँवरी (विवाह मंडप) में बैठने के बाद वधू का हाथ वर के हाथ में दिया जाता है, जिसे हथलेवा (पाणिग्रहण) कहते हैं। इसके बाद अग्नि को साक्षी मानकर जीवन भर साथ निभाने के वादे के साथ सात फेरे लिए जाते हैं।
- कन्यादान और अन्य रस्में: दूल्हे द्वारा किये जाने वाले अभिवादन को ‘जंवारी’ कहते हैं। माता-पिता द्वारा अपनी पुत्री की जिम्मेदारी वर को सौंपना कन्यादान कहलाता है। बारात विदाई के समय वधू पक्ष द्वारा बारातियों को दी जाने वाली भेंट ‘रंगबरी’ या ‘पहरावणी’ कहलाती है।
- मुकलावा (गौना) और आणौ: यदि विवाह बालपन में हो जाए, तो बालिग होने पर वधू को वर के घर भेजने की रस्म मुकलावा या ‘गौना’ कहलाती है। विवाह के पश्चात् दुल्हन को दूसरी बार ससुराल भेजना ‘आणौ’ कहलाता है।
- बढार: विवाह के दूसरे दिन वर पक्ष द्वारा नवदम्पति के आशीर्वाद समारोह के लिए जो प्रतिभोज रखा जाता है, उसे बढार का भोज कहते हैं।
विवाह से जुड़े कुछ अन्य रोचक तथ्य:
- दो पक्षों के मध्य विवाह संबंध कराने वाले मध्यस्थ को ‘बड़ोलिया’ कहते हैं।
- विवाह के समय प्रातः काल गाए जाने वाले मांगलिक गीतों को बयाणौ तथा पुत्री की विदाई पर गाए जाने वाले गीत को घुड़लौ कहते हैं।
- कन्या की विदाई के समय दिया जाने वाला सामान (दहेज) ओझण, उजणौ या दायजो कहलाता है और दुल्हन की झोली भरने की रस्म छोल कहलाती है।
- विवाह के बाद वधू के स्वागत में किया जाने वाला भोज बरोटी और नव वधू को दिया जाने वाला कलेवा हीरावणी कहलाता है।
- राजस्थानी संस्कृति में नववधू के साथ जो लड़की या स्त्री जाती है, उसे ओलंदी कहते हैं।
- वर पक्ष की ओर से दिया जाने वाला भोज जानोटण कहलाता है।
- विवाह का शुभ मुहूर्त सावी कहलाता है और नव आगंतुक वधू का प्रथम परिचय हथबोलणो कहलाता है।
- ढूँढाड़ क्षेत्र में बारात जाने के बाद पीछे से वर पक्ष की महिलाओं द्वारा रात को गाए जाने वाले गीत और खेल को टूटिया कहते हैं, और विवाह के समय गाए जाने वाले गाली गीतों को सींठड़ा कहते हैं।
- भोजन पकाने के लिए लाई जाने वाली लकड़ियाँ ‘मुगधण’ कहलाती हैं।
3. शोक या गमी की रस्में (अंतिम विदाई का सम्मान)
जन्म और विवाह के उल्लास के विपरीत, मृत्यु से जुड़े संस्कार बेहद शांत और सम्मानजनक होते हैं:
- बैकुण्ठी और बिखेर/उछाल: मृत व्यक्ति को श्मशान ले जाने के लिए बाँस की जो शय्या बनाई जाती है, उसे बैकुण्ठी कहते हैं। इस बैकुण्ठी के पीछे कौड़ियाँ या पैसे उछाले जाते हैं, जिसे बखेर या उछाल कहते हैं।
- दण्डोत और आधेटा: बैकुण्ठी के आगे रिश्तेदारों द्वारा जो प्रणाम किया जाता है, वह दण्डोत कहलाता है। श्मशान के आधे रास्ते पर पहुँचकर बैकुण्ठी की दिशा बदलने की रस्म को आधेटा कहते हैं।
- अन्त्येष्टि और कपाल क्रिया: मृतक को आग देना लांपा, दाह संस्कार या मुखाग्नि कहलाता है। जब शव जल रहा होता है, तो उत्तराधिकारी द्वारा दाह संस्कार के समय शव के कपाल (सिर) को फोड़कर उसमें घी डालने की प्रक्रिया ‘कपाल क्रिया’ कहलाती है।
- भद्दर और पाणीवाड़ा: दाह संस्कार के समय मृत व्यक्ति के पुत्रों द्वारा बाल कटवाने को ‘भद्दर देना’ कहते हैं। मृत्यु के समय सब लोगों का एकत्र होकर स्नान करना और शोकाकुल परिवार को सांत्वना देना ‘पाणीवाड़ा’ कहलाता है।
- फूल चुगना और तीया: दाह संस्कार के तीसरे दिन मृतक की हड्डियाँ (फूल) एकत्रित किए जाते हैं जिन्हें हरिद्वार या पुष्कर में विसर्जित किया जाता है। इसी दिन रिश्तेदारों की बैठक होती है जिसे तीया कहते हैं।
- सांतरवाड़ा और मृत्युभोज: मृत्यु से लेकर 12वें दिन तक लोगों का शोक मनाने आना ‘सांतरवाड़ा’ कहलाता है। मृत्यु के बारहवें दिन जो मृत्युभोज होता है उसे ‘मौसर’ या ‘नुक्ता’ कहते हैं। इसके विपरीत, जीवित व्यक्ति द्वारा स्वयं की मृत्यु से पहले ही किया गया भोज ‘जोसर’ कहलाता है।
- पगड़ी रस्म: मौसर वाले दिन सबसे बड़े पुत्र को पगड़ी बांधकर उत्तराधिकारी घोषित किया जाता है। मृतक के 12वें दिन अशौच निवारणार्थ पानी से भरे मटके को ‘दोखणियां’ कहते हैं। मृतक की आत्मा की शांति के लिए नारायणबलि या पिण्डदान किया जाता है।
4. राजस्थान की अन्य प्रमुख और ऐतिहासिक प्रथाएँ
समाज समय के साथ बदलता है। राजस्थान में भी कई ऐसी प्रथाएं रहीं जो ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण थीं, लेकिन समय के साथ उन्हें कुप्रथा मानकर बंद कर दिया गया:
- नाता प्रथा: इसमें पत्नी अपने पति के जीते जी बिना फेरे के किसी अन्य पुरुष के साथ रहने लग जाती है। यह आदिवासियों में अधिक प्रचलित है।
- जौहर और केसरिया: युद्ध के पश्चात रानियाँ और महिलाएँ अपने सतीत्व की रक्षा के लिए स्वयं को अग्नि में समर्पित कर देती थीं, जिसे जौहर कहा जाता था। वहीं राजपूत वीर योद्धा केसरिया वस्त्र धारण कर युद्ध में मृत्यु को प्राप्त होने तक लड़ते थे, जिसे केसरिया करना कहते थे।
- सती प्रथा: पति की मृत्यु के बाद पत्नी का उसकी चिता के साथ जल जाना। राजस्थान में सर्वप्रथम बूंदी रियासत ने 1822 में इसे बैन किया था। 1987 में सीकर की घटना के बाद ‘सती रोकथाम अधिनियम 1987’ लागू किया गया।
- डाबरिया प्रथा: प्राचीन काल में राजा-महाराजा अपनी लड़कियों की शादी में दहेज के रूप में कुंवारी कन्याएँ भी साथ देते थे।
- त्याग प्रथा: राजकुमारियों के विवाह पर चारण साहित्यकारों व भाटों को दिया जाने वाला उपहार त्याग कहलाता था। 1841 में जोधपुर के महाराजा मानसिंह ने इस पर रोक लगाई।
- डाकन प्रथा और समाधि प्रथा: किसी स्त्री पर डाकन होने का आरोप लगाकर उसे प्रताड़ित करना डाकन प्रथा थी। 1853 में मेवाड़ के महाराणा स्वरूप सिंह ने इस पर सर्वप्रथम रोक लगाई। 1844 ई. में जयपुर रियासत में समाधि प्रथा पर रोक लगी।
- बाल विवाह और कन्यावध: कम उम्र में शादी करना बाल विवाह है। 1929 में ‘शारदा एक्ट’ पारित करवाया गया। कन्या जन्म को अशुभ मानकर मार देने की प्रथा पर 1833 में कोटा रियासत ने सबसे पहले रोक लगाई।
- दास, बेगार और सागड़ी प्रथा: युद्ध बंदी या ऋण न चुकाने वालों को दास बनाया जाता था। बिना वेतन के काम करवाना बेगार प्रथा थी। कर्ज के बदले बंधुआ मजदूर बनाने की सागड़ी प्रथा पर 1961 में रोक लगाई गई।
- अन्य जनजातीय प्रथाएं: जैन धर्म में अन्न-जल त्यागकर प्राण त्यागने को ‘संथारा’ कहते हैं। आदिवासियों में वधु मूल्य चुकाकर विवाह करने को ‘दापा’ प्रथा और मृत्यु के समय लिए जाने वाले हर्जाने को ‘मौताणा’ कहते हैं।
निष्कर्ष
राजस्थान के ये रीति-रिवाज केवल पुराने समय की कहानियाँ नहीं हैं, बल्कि यह दर्शाते हैं कि यहाँ का समाज किस तरह अपने हर सुख-दुःख को एक सामाजिक उत्सव और नियमों में बांधकर जीता आया है। जहाँ एक ओर जन्म और विवाह के संस्कार जीवन को उल्लास देते हैं, वहीं कुछ पुरानी कुप्रथाओं का अंत समाज की प्रगतिशील सोच को भी दिखाता है।












